Thursday, May 25, 2017

स्नेह-पाश



आज भीड़ को परे हटा कर
हल्के क़दमों  कोई साया
धीमे से मेरी छिगुनी थामे
निर्भृत कोने  में    आया

हल्की उस एक छुअन में
दबी   थी  कितनी  बातें
अँगड़ाई लेते अतीत  में
ग्रीष्म,  शिशिर, बरसातें

नन्हें-नन्हें  स्मृति खंड वे
चंचल  पग   से    भागे
मेरे विह्वल मोह पर हँस दें
निकले   मुझसे   आगे

कुछ स्मृतियाँ थीं अट्टहास की
प्रेम- स्निग्ध  नयनों  की
कुछ खिलखिल गोपन  बातें
कुछ व्यंग्य -बोल ,बैनों  की

तपती जेठ की भरी दोपहरी
ओझल  हो  कोई  कोना
निश्वास गगन के संग -संग
अबूझ  था  मन  का रोना

बरसाती ,सोंधी ख़ुशबू  और
श्रावणी   मेघ   मल्हारें
पेंगें  भर आकाश को छू लें
मुक्ता -  मणि  उतारें

आज  कहाँ से विस्मृत घड़ियाँ
नर्तन   कर  लहराईं?
एक स्पर्श से  हृदय बाँध
कुहेल धूम्र  सी  छाईं  !

कितने  वादे , कितनी बातें
सच थे  या  थे सपने?
मन-आँगन के मंच पर सारे
सज गये  कितने  अपने!

खींच चले जब स्नेह-पाश में
मन स्वंय हुआ निरुत्तर
विकल ,विरागी मन ने पाया
शाश्वत  प्रश्न  का उत्तर

जीवन की उधेड़-बुन में
सालों  रहा  अकिंचन
आज अचानक सरस कर गया
स्निग्ध पाश  का  बन्धन!

वीणा सिंह 





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