Friday, May 26, 2017

झारखंड का बिरवा



झारखंड  का नन्हा  बिरवा
सागर  तट   पर   आया,
देख  के झिलमिल जल की लहरें
मन मृग  था  भरमाया

ऊपर  नील आकाश झुका
नीचे पारे  का  दर्पण
मुग्ध ज्योत्सना बिछी हुई
सब कुछ करने को अर्पण

संझा का  वह  नील  रंग
नीम  आलोक का  जादू
किसी रहस्य के नीचे ठिठका
बिरवा  हुआ   बेक़ाबू!

उच्छल जल की कलकल लहरी
बेकल  करती  मन  को
जैसे तान तरंगित कर दे
रहस्य घिरे प्रांगण  को

वर्षों की कोई  आशा  भूली
या  एक  पल  की  माया
बिरवा  चला उस पल को थामे
बस  डूबा – उतराया  !

दूर-दूर  तक स्निग्ध नमी थी
बस  कोई  छोर  नहीं  था
मन को  लेकिन बाँध  सके
ऐसा भी  ज़ोर नहीं  था

शीतल जल की कोमल लहरी
दूर निकल  वह   आया
जब देखी  नभ की परछाईं
हृदय  विकल  हो  आया



कहाँ गई वह  मोहिनी  माया
नीलम नभ  की छाया
अंधकार  के पाश  बँधी
धवल  चाँद  की  काया

पट- परिवर्तन के होते ही
मिथ्या  से  बाहर  आया
निर्जन मंच पर ख़ुद को देखा
हृदय  बड़ा  घबराया!

स्निग्ध लहर  का आकर्षण  था
नित नवीन  का  सुख  था
लेकिन  मिट्टी  यहाँ  कहाँ
बस इसी  बात  का  दुख था।

चारों  ओर  रेती  ही  रेती
बाँध  सके न  तन  को
उलझ जाए  पाँवों में लेकिन
जकड़ सके  न  मन  को

कलकल  बहते  जल  के नीचे
धरती यहाँ  कहाँ  थी?
तन भीगा, पर  मन था भारी
यह कोई  और  जहाँ  थी!

मिट्टी  के  आँगन  में  पनपा
मिट्टी का था  जाया
सागर  तट  पर  मिट्टी छूटी
जल में  घुल  गई  काया!

वीणा सिंह

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