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Thursday, November 25, 2021

मोहाविष्ट

 सूरज की पहली लाली संग

चला बटोही हँसते-हँसते

सपनों का पाथेय संग था

अनजाने थे उसके रस्ते

 

अनजानी थी सभी दिशायें

मोहाविष्ट चला जाता था

मन ही मन अपनी धुन में वह

सपनों को बुनता जाता था

 

कौन भला रोकेगा उसको

उड़ता जाता पर फैलाये

अनन्त समन्दर सा फैला नभ

पल-पल उसको पास बुलाये

 

उन्नत शाख़, शाख़ पर झूले

झूलों पर फूलों के गहने

मद्धम-मद्धम से बयार में 

सारे गहने लगते अपने

नीम अँधेरे देखे सपने 

सच में मिथ्या मिला हुआ था

जैसे सच की एक सीपी में

झूठ का मोती खिला हुआ था

 

नीले नभ के एक कोने में

धूसर बदली की थी छाया

पल भर में जाने फिर कैसे 

कोमल बयार की बदली माया

 

झंझावात के आलोड़न में 

सपनों का पाथेय कहाँ था?

होंठों की मुस्कान कहाँ थी?

जीवन का वह ध्येय कहाँ था?

 

पल में सिमट गया सारा जल

अन्तर के गहरे सागर में

सहमा-सहमा बैठ गया फिर

उसके नयनों के गागर में

 

वीणा सिंह