Saturday, June 23, 2012

बातें



इंसान का क्या वजूद !
बातों का वजूद है
चलती है फिरती है
होंठों पर मचलती है
समंदर के तूफ़ान सी
सीने में उफनती है
सोफे पर पसरती है
कोने से निकलती है
बेआवाज कमरों में
प्रेत सी टहलती है
होंठों की जुम्बिश में
गुमनाम रहती है
चेहरे की लकीरों में
सदियों से बहती है

इंसानों के बीच में
बैठती है बातें
इंसानों के साथ ही
 लेटती हैं बातें
आदमी तो चुप है
संवाद ही झगड़ते हैं
दिन काल की फेहरिस्त ले
आपस में लड़ते हैं 
`याद है' `सब याद है'
कुछ भी तो भूला नहीं 
पल भर में बदल दे 
अच्छे भले वजूद को
तंग होकर रंज होकर
छोड़ देता है कमरे को
चुप होकर भी
गरजती रहती हैं बातें
हथियार की शक्ल में ढलती हैं
तल्खियों में बदलती हैं
तनी हुई नोक से चुभती हैं
धीरे धीरे
आदमी की शक्ल
अख्तियार करती हैं बातें


वीणा सिंह

Saturday, June 16, 2012

जमीन

बहुत अंगार लिये फिरती है अपनी जमीं
आसमाँ को हवा दे दो,थोड़ा  पिघल जाए


बेसुरी कैफियत के रात-दिन मजमे लगे रहे
सुर कोई नया छेड़ो,तरन्नुम में ढल जाए

सदियों बुत तराशते रहे,बुत बने रहे
ऐसी चोट दो उनसे कभी खुदा निकल आए

दिन-रात पलटते रहे हम वर्क माजी के
पर्चे बाँट दो पेश्तरकि ये नक्शा बदल जाए

बिलावजह बैठे रहे परशिकस्त रात भर
खिड़कियाँ खोलने की देर है,मंजर बदल जाए.


वीणा सिंह

रुई का एडवेंचर

दादी जी के कमरे में थी
बहुत बड़ी  संदूक   पड़ी
दादी ने जब ताला खोला
निकली एक रजाई बड़ी.

रेशम का सुंदरकपड़ा था
रजाई मगर पुरानी थी
दादीजी जब ब्याह के आईं
तब की एक निशानी थी

दादी धुनिया को ले आईं
धुनिया धुनकी ले आया
धुनकी पर टंकार जो आई
सबको बहुत मजा आया.

इसी मौज में नटखट रुई
धुनकी के तार पर झूल पड़ी
कहाँ संदूक में दबी हुई थी
फूल के कुप्पा हुई बड़ी!

निकली घर से बाहर आई
बादल बन के वह बौराई
पुरवा के झूले पर झूली

सेमल की डाली पर छाई

इसी तरह से हँसते-गाते
वीराने में निकल गई
पहलीबारबाहर निकली थी
घर का रस्ता भूल गई.

सुबह जो खोजा,नदी किनारे
हरी घास पर पड़ी मिली 
लिपट घास से रोई रात भर
आँखों में शबनम जड़ी मिली.


वीणा सिंह


















Monday, June 4, 2012

ठीक उसी समय

जब पतझर में
अपनी सारी कमनीयता खोकर
काठ हो जाते हैं वृक्ष
और वायु रुद्ध
तब श्वासावरुद्ध खड़खड़ाते पत्तों की ताल पर
भटकने लगता है उद्देश्यहीन मन
और समय झरने लगता है
रेत बनकर।
कहीं कोई जादूगर
संकेतों की तर्जनी पर
बहाये लिये जाता है इन्हें
 समय के समंदर में डुबोने।
तब कोई नहीं जानता
नेपथ्य में साथ-साथ
हो चुका है आयोजन-
ठूँठों की शिराओं में
प्रज्वलित प्राणाग्नि
जैसे बुझे हुए काष्ठ के भीतर
कौंधती नीली लौ।
ठीक उसी समय
विकलता के चरम क्षणों की तंत्री पर
झंकृत हो उठा है जीवन-राग।
ठीक उसी समय
चटख धूप के साथ
लॉन पर मृतप्राय वृक्ष
मूर्त हो उठा है
किसी सुन्दर अमूर्त पेंटिंग की तरह।


वीणा सिंह