Monday, June 4, 2012

ठीक उसी समय

जब पतझर में
अपनी सारी कमनीयता खोकर
काठ हो जाते हैं वृक्ष
और वायु रुद्ध
तब श्वासावरुद्ध खड़खड़ाते पत्तों की ताल पर
भटकने लगता है उद्देश्यहीन मन
और समय झरने लगता है
रेत बनकर।
कहीं कोई जादूगर
संकेतों की तर्जनी पर
बहाये लिये जाता है इन्हें
 समय के समंदर में डुबोने।
तब कोई नहीं जानता
नेपथ्य में साथ-साथ
हो चुका है आयोजन-
ठूँठों की शिराओं में
प्रज्वलित प्राणाग्नि
जैसे बुझे हुए काष्ठ के भीतर
कौंधती नीली लौ।
ठीक उसी समय
विकलता के चरम क्षणों की तंत्री पर
झंकृत हो उठा है जीवन-राग।
ठीक उसी समय
चटख धूप के साथ
लॉन पर मृतप्राय वृक्ष
मूर्त हो उठा है
किसी सुन्दर अमूर्त पेंटिंग की तरह।


वीणा सिंह

  

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