इंसान का क्या वजूद !
बातों का वजूद है
चलती है फिरती है
होंठों पर मचलती है
समंदर के तूफ़ान सी
सीने में उफनती है
सोफे पर पसरती है
कोने से निकलती है
बेआवाज कमरों में
प्रेत सी टहलती है
होंठों की जुम्बिश में
गुमनाम रहती है
चेहरे की लकीरों में
सदियों से बहती है
इंसानों के बीच में
बैठती है बातें
इंसानों के साथ ही
लेटती हैं बातें
आदमी तो चुप है
संवाद ही झगड़ते हैं
दिन काल की फेहरिस्त ले
आपस में लड़ते हैं
`याद है' `सब याद है'
कुछ भी तो भूला नहीं
पल भर में बदल दे
अच्छे भले वजूद को
तंग होकर रंज होकर
छोड़ देता है कमरे को
चुप होकर भी
गरजती रहती हैं बातें
हथियार की शक्ल में ढलती हैं
तल्खियों में बदलती हैं
तनी हुई नोक से चुभती हैं
धीरे धीरे
आदमी की शक्ल
अख्तियार करती हैं बातें
वीणा सिंह
No comments:
Post a Comment