Sunday, October 20, 2013

हे पौत्र गुरु

(रेहान के लिए)
तुम आज भी स्थिर हो

हर आलोचना और आंदोलन के बीच

जबकि जटिलताओं के मध्य

लड़खड़ा रही है स्थितियां,

तुम्हें पता है अपना लक्ष्य;

अपनी तृष्णा, अपनी पूंजी

अपने प्रयास, अपने  मोलतोल,

अपने विनिमय,  बाँट-बखरे

सटीक शब्दों के गिने चुने सिक्के

मीठी मोहक आकर्षक मुस्कान का पासंग

सहज ही आमंत्रित कर लेती है

मुग्ध प्रशंसकों की भीड़

तुम्हारी तोतली जुबान

और घुटनों तक आता

बूटा सा तुम्हारा कद

हावी हो जाता है सब पर.

समय असमय हम सब ने भी

इस्तेमाल किये हैं

अपने  तरकश के तीर,

पर तमाम चालाकियों के बावजूद

धरे रह गये

हमारे साँप-सीढ़ी के खेल.

हमने बहुत चाहा,

पर सीख नहीं पाये तुमसे

तितलियों के पीछे दौड़ना,

बारिश की बूंदों में उछलना,

गीली मिट्टी को वस्त्र की तरह पहनना.

चुनौतियों की कसी हुई पेटियों में

अपने आभिजात्यपन को समेटे,

हमने नहीं सीखा

खुद से खुद को अलग करना

और कहते रहे सबसे-------

चाकलेट और खिलौनों के

दिन अब नहीं रहे!

 
वीणा सिंह
 

       

 

 

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