Sunday, February 26, 2017

गरल

बचपन में सुना था
देव और  दानवों का वह  किस्सा
भयंकर उथल-पुथल,
आलोड़ित सागर का मंथन,
अमृत  और  विष का  निकलना -
तुम भी  तो हो  समुद्र!
तुम्हारे  अंदर भी है  गरल,
बहता  रहता  है  तुमसे  निकल ,
चतुर्दिक  विष  तरल
दूषित  करता है,
पृथ्वी-आकाश!
तुम  शिव नहीं  जो धारण  कर   सको
सबके हित
वह बहता ,विषाक्त   पित्त
सिर्फ़   कर सकते  हो  एक ज्वालामुखी  की सृष्टि,
जिसमें  हो  जायें  क्षार  -
शक्तियाँ  असीमित  ,
अपने विदूषकीय   चमत्कारों   से
अग्नि  -वृष्टि  ,
अनेक   स्फुलिंगों   से निर्मित
अपने  अहंकार में
अमानवीय  प्रहार  में
देख   नहीं   पाए-हो  चुका कब   का
अनेक  शिवों  का  निर्माण!
धारण  किए  कंठ  में  कबसे
कभी  भी  ,उस  विष  को
हैं   वमन  करने  को प्रस्तुत
ठीक  उसी  दिन होगा 
इसी  विष  से  तुम्हारा  सर्वनाश !!

वीणा सिंह

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