जब प्रभात क्रीड़ा संगी बन
मुझको आकर घेरे
स्वर्ण किरण मुट्ठी में भींचे
रोज लगाए फेरे
स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये
किसी पुराने विस्मृत पल सा
बचपन मुझे बुलाये
आह्लादित हो जग को देखे
भाव प्रवण हो जाये
मेरे मन की सहज प्रतीति
अरुणिम फूल खिलाये
कीट पतंगे पक्षी प्राणी
तृण अपतृण और बादल
कण-कण है सम्पूर्ण
चमत्कृत सृष्टि रहती हर पल
रातों की रिमझिम ले आयी
परी लोक के सपने
संध्या को माँ की बोली में
तारे लगते अपने
स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये
किसी पुराने विस्मृत पल सा
बचपन मुझे बुलाये
(रवीन्द्रनाथ की कविता से प्रेरित)
वीणा सिंह
मुझको आकर घेरे
स्वर्ण किरण मुट्ठी में भींचे
रोज लगाए फेरे
स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये
किसी पुराने विस्मृत पल सा
बचपन मुझे बुलाये
आह्लादित हो जग को देखे
भाव प्रवण हो जाये
मेरे मन की सहज प्रतीति
अरुणिम फूल खिलाये
कीट पतंगे पक्षी प्राणी
तृण अपतृण और बादल
कण-कण है सम्पूर्ण
चमत्कृत सृष्टि रहती हर पल
रातों की रिमझिम ले आयी
परी लोक के सपने
संध्या को माँ की बोली में
तारे लगते अपने
स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये
किसी पुराने विस्मृत पल सा
बचपन मुझे बुलाये
(रवीन्द्रनाथ की कविता से प्रेरित)
वीणा सिंह
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