Friday, March 3, 2017

बचपन

जब प्रभात क्रीड़ा संगी बन 
मुझको आकर घेरे 
स्वर्ण किरण मुट्ठी में भींचे 
रोज लगाए फेरे 

स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये 
किसी पुराने विस्मृत पल सा 
बचपन मुझे बुलाये 

आह्लादित हो जग को देखे 
भाव प्रवण हो जाये 
मेरे मन की सहज प्रतीति 
अरुणिम फूल खिलाये 

कीट पतंगे पक्षी प्राणी
तृण अपतृण और बादल
कण-कण है सम्पूर्ण
चमत्कृत सृष्टि रहती हर पल

रातों  की रिमझिम ले आयी 
परी लोक के सपने 
संध्या को माँ की बोली में
तारे लगते अपने 

स्मृतियों का अवरुद्ध झरोखा
धीमे से खुल जाये 
किसी पुराने विस्मृत पल सा 
बचपन मुझे बुलाये 



(रवीन्द्रनाथ की कविता से प्रेरित)

वीणा सिंह


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