अभी भी याद हैं किस्से
कभी आये मेरे हिस्से
कुछ पन्ने खोलते हैं
अकेले में अगर चुप हूँ
तो मुझसे बोलते हैं
कहीं गुडियों की बारातें
कहीं जंगल की थीं रातें
कहीं कोई पेड़ था होता
कि जिसपर बोलता तोता
कहीं कोई वीर राजा
और उसकी सुंदरी रानी
फैली दूर तक मीलों,
बड़ी शोहरत की कहानी!
वह मजिलस मेरे ख्वाबों की
रहती रोज़ आँगन में,
सवाल बोलते रहते थे जब
चुपचाप से मन में !
सितारों से सजी महफ़िल
या शायद चाँद का जादू
सुदूर घंटे की आवाज़ पर
धड़कन थी बेक़ाबू !
अचानक मंच पर सज के
मुँडेरों से घिरी छत पे
क़िस्सों से निकल के
पुतलियों का नाच सजता था
हवाओं की लहर में नाचती
जादू सा कोई गीत बजता था!
वे क़िस्से रोज़ के ऐसे
कि जैसे एक विरासत हो
कुछ ख़ामोश ,नामालूम सी
कोई रवायत हो ,
एक दूजे में गुँथी ख़ूबसूरत
क़िस्सों की कड़ियाँ -
क़सीदे बाँध कर रख दें
रेशमी डोर की लड़ियाँ
नहीं ये बोल ,सिर्फ़ एहसास
एक दूजे को बयाँ थे,
कई पीढ़ियों की जज़्बात
जैसे दिल में रवाँ थे!
सहज थे बोल,क़िस्से थे सहज
दादी-नानी ने बाँचे !
परी के देश के मोती ,
हमारी भाषा में साँचे!
वीणा सिंह
No comments:
Post a Comment