Saturday, March 4, 2017

बचपन के क़िस्से




अभी भी याद हैं किस्से
कभी आये मेरे  हिस्से
कुछ पन्ने खोलते  हैं
अकेले में  अगर  चुप हूँ
तो मुझसे  बोलते  हैं
कहीं गुडियों की  बारातें
कहीं जंगल की थीं रातें
कहीं कोई पेड़ था  होता
कि जिसपर बोलता तोता
कहीं कोई  वीर  राजा
और उसकी  सुंदरी रानी
फैली दूर तक मीलों,
बड़ी शोहरत की कहानी!
वह मजिलस मेरे  ख्वाबों की
रहती रोज़  आँगन   में,
सवाल बोलते रहते थे जब
चुपचाप  से  मन   में   !
सितारों से सजी  महफ़िल
या  शायद चाँद का जादू
सुदूर घंटे की आवाज़ पर
धड़कन   थी  बेक़ाबू  !
अचानक मंच पर  सज के
मुँडेरों से घिरी  छत  पे
क़िस्सों से निकल के
पुतलियों का नाच सजता था
हवाओं की लहर में नाचती
जादू सा  कोई  गीत बजता था!
वे क़िस्से रोज़ के  ऐसे 
कि जैसे एक  विरासत हो
कुछ ख़ामोश ,नामालूम  सी
कोई  रवायत  हो ,
एक दूजे में गुँथी ख़ूबसूरत
क़िस्सों  की  कड़ियाँ  -
क़सीदे बाँध कर रख दें
रेशमी  डोर  की लड़ियाँ
नहीं ये बोल ,सिर्फ़ एहसास
एक दूजे को बयाँ थे,
कई  पीढ़ियों की जज़्बात
जैसे  दिल में  रवाँ  थे!
सहज थे बोल,क़िस्से थे सहज
दादी-नानी  ने बाँचे !
परी के देश के मोती ,
हमारी  भाषा में साँचे!


वीणा सिंह

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