अदन के बाग़ से जब भी गिरी है ये हव्वा
फलक की डोर उसकी उँगलियों से लिपटीहै
पलक की कोर में चुभती है एक नमी बनकर
वह कायनात निगाहों में कहीं सिमटी है
वह पुरसुकून चमन , एहसास के हसीं लम्हे
लमहा लमहा पकड़ने की पूरी फ़ुरसत थी
था एहसास अपनी अाती-जाती साँसों का
वह आबशार जिसमें चाँदनी की राहत थी
लेकिन अब भी कहीं ख़्वाब कसमसाते हैं
कि पन्नों में दरख़्त - बूटे बनके ढलते हैं
अदन के क़तरे सीने में अब भी बाक़ी है
उदास हर्फ़ अर्श की लौ बनके जलते है
वीणा सिंह
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