Friday, March 10, 2017

धूप यहाँ की, वहाँ की



यहाँ धूप आभिजात्य है
ड्राइंग रूम के सोफे पर
संभली सी बैठी है
अपरिचित, अर्धस्मित !
खुलते- खुलते ही खुलेगी,
अभी शायद देर लगेगी ।
छोटे बड़े विस्तारों पर
उचाट सी दृष्टि है
नपे तुले क्षण हैं
जाने की जल्दी है
क्षणिक मुलाकातों की
पूरी फेहरिस्त अभी बाकी है
ऐसे ही आते -जाते
मुलाकात कर लेगी
रस्म निभा जायेगी - चलते-चलते कह जाती है ।

वहां धूप देहातन है !
सुबह सबेरे किरणों की
जहाँ-तहाँ  अल्पना सजा
खाट पर पसरी प्रतीक्षा में है –

कोई आए , बतियाए ।

फिर वह उठेगी ,
मेंहदी के पत्तों में
सुर्ख रंग भरेगी ,
मिट्टी को और सोंधी करेगी ,
गुलाब को और कोमल ।

फिर डाँव- डाँव घूमकर
दोपहर को चबूतरे पर पसर जायेगी ।

और अभी शाम बाकी है ।

जा बैठेगी छत की चटाई पर
अंधेरे - उजाले की चौखट पर ठिठकी
थरथराती हवा को महसूसती
कुछ व्यग्र - चिंताग्रस्त !

पर मैं आश्वस्त हूँ -
जाने के पहले वह
पूरी सुरक्षा कर जाएगी,
दरवाजे पर चाँदनी को
पहरे पर बिठाएगी ।

वीणा सिंह 



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