बहुत अकेला था वह पंछी
उड़ता-उड़ता,मारा-मारा
ऊपर उड़ते काले बादल
नीचे बहता पानी खारा
यहाँ-वहाँ आते-जाते वह
जाने क्या-क्या सोचा करता
ऊन के उलझे गोले सा वह
यहाँ-वहाँ पर डोला करता
पेड़ से टूटी टहनी ले ली
सूरज से ले लिया अंगारा
डाली से कुछ फूल उठाए
फिर भी मन था एक बंजारा
रात कहानी तो मीठी थी
भोर भये नमकीन भई क्यों?
हँसी-हँसी में बातें कहती
आँखें फिर गमगीन भईं क्यों?
वीणा सिंह
उड़ता-उड़ता,मारा-मारा
ऊपर उड़ते काले बादल
नीचे बहता पानी खारा
यहाँ-वहाँ आते-जाते वह
जाने क्या-क्या सोचा करता
ऊन के उलझे गोले सा वह
यहाँ-वहाँ पर डोला करता
पेड़ से टूटी टहनी ले ली
सूरज से ले लिया अंगारा
डाली से कुछ फूल उठाए
फिर भी मन था एक बंजारा
रात कहानी तो मीठी थी
भोर भये नमकीन भई क्यों?
हँसी-हँसी में बातें कहती
आँखें फिर गमगीन भईं क्यों?
वीणा सिंह
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