शून्य की चारपाई पर
थोड़ा अधलेटे, कुछ बैठे
कुछ अपने आप से रूठे
अपनी सफेद दाढ़ी पर
उंगलियाँ फिराते
ऊब उठे अचानक!
मन की तरंग मचली,
तूलिका में बदली,
कई रंगों में ढली,
कैनवस पर छिटकी,
सागर की नन्हीं बूंदें,
सपने भर आँखें मूंदे
रस इधर-उधर छलका
स्निग्ध भाव सोए
झरनों से फूटे
कहीं तरल नदियाँ
कहीं बेल-बूटे!
हो उठा साकार
क्षितिज का विस्तार-
बना एक कोलाज!!
वीणा सिंह
थोड़ा अधलेटे, कुछ बैठे
कुछ अपने आप से रूठे
अपनी सफेद दाढ़ी पर
उंगलियाँ फिराते
ऊब उठे अचानक!
मन की तरंग मचली,
तूलिका में बदली,
कई रंगों में ढली,
कैनवस पर छिटकी,
सागर की नन्हीं बूंदें,
सपने भर आँखें मूंदे
रस इधर-उधर छलका
स्निग्ध भाव सोए
झरनों से फूटे
कहीं तरल नदियाँ
कहीं बेल-बूटे!
हो उठा साकार
क्षितिज का विस्तार-
बना एक कोलाज!!
वीणा सिंह
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