कल जाने क्या बात हो गयी
आधी-आधी रात हो गयी
बहुत रात को जिन जब आया
अपनी थैली बिन वह आया
सब कुछ पहले सही हुआ था
ऐसा पहले नहीं हुआ था
चाँद-सितारों के उस घर से
आसमान से दूर शहर से
जाने क्या-क्या ले आता था
मुझको सपने दे जाता था
चाँद सितारों की वह दुनिया
आइसक्रीम चाकलेट की दुनिया
लाता था वहाँ से थोड़ी
सपनों में वह चाट पकौड़ी
फूल पहाड़ नदी और झरने
उन सपनों के थे क्या कहने
आते ही थका सा बोला
(चलो कम से कम मुँह तो खोला)
सबको अपनी अपनी पड़ी है
मेरी मुश्किल बहुत पड़ी है
इसको दे दूँ उसको दे दूँ
आख़िर किसको किसको दे दूँ
मुझको भी दो छुट्टी भाई
नहीं तो तुमसे कुट्टी भाई
न कोई सी एल न कोई ई एल
खटता रहता हूँ मैं हर पल
मुझको भी तुम लिफ़्ट करा दो
थोड़ी सी तुम लिफ़्ट करा दो
सिक लीव की यह अर्ज़ी है
आज तो मेरी भी मर्ज़ी है
हाथ में देकर चला गया वह
पल भर में बस धुआँ हुआ वह
वीणा सिंह
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