वो जो आसमान पे बैठा है हरुफ बिगाड़ने की साजिश में
कि बाज़ी पलट भी जाती है जरा सी मोहरों की जुम्बिश में
सफर में उस जगह जायें क्योंकर जहाँ से रात आके मिलती हो
कोई तो मोड़ उस जगह होगा कि जहाँ सुबह आके खिलती हो
खुदा के बाजुओं में इन दिनों ताकत कहाँ इतनी
कि धर के हाथ शाने पे हमारे कोई राहत दे
कि हम तो शिद्दत्तों से बारहा सजदे में झुक जाएँ
उससे बन पड़े तो मेरे वीराने को रंगत दे
वीणा सिंह
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