Thursday, November 12, 2020

डायरी लिखने पर

 

निस्तब्ध मौन पड़े रहने दो इन्हें 

मेरी अंगुली थामे — निरापद

मेरे ही अंतस में 

शब्दों के दुर्बल कंधों पर 

किसी क्षण का बोझ मत डालो 

रंगे हुए पृष्ठों  की यह दूरी 

और कुछ नहीं आडंबर है 

या फिर एक प्रचलन हास्यास्पद !

इस मरुयात्रा ने कोमलता के नाम पर 

बार बार छला है 

दुहराई है वे  ही यातनाएं 

रहने दो इन्हें यहीं— निष्कंटक 

इस निर्जन वीथिका में मुक्त 

किसी भी आततायी  के पदचाप से 

एक इतिहास कुहरा ढँका

चुपचाप अपने आप में अवगुंठित!

 

वीणा सिंह         

No comments:

Post a Comment