भ्रम ही सही
पर आसान नहीं झेलना
असह्य यंत्रणा उस छोटे से क्षण की
जब लगे जैसे तुम्हारे ही कारण
तुम्हारी हथेली का आकाश
कुछ और सिमट आया है
तुम्हारे ही हाथों संभव है यह
मसीहा बनकर चुपचाप दे देना
अपने रक्त का एक-एक कण
किसी और के स्वप्न के लिए
पर विश्वास मानो
समर्पण की यह यातना
मैंने अकेले ही झेली है क्षण-अनुक्षण
ग्रहण करते वक़्त अपनी पूरी प्रक्रिया में
निःशेष होती यज्ञ की अग्नि में
जब प्रश्न हो समक्ष दुविधा भरे चुनाव का
तब संभव हो तुम समझ लो विवशता
अपने ही हाथों अपनी
सबसे प्रिय वस्तु की बलि का
पर व्यथा — इस अनचाही हत्या की
नहीं समझ पाओगे
शायद एक अलग अस्तित्व होता हो
हर एक संवेदना का
एक सही स्थिति भी
एक अपना ही दर्द उसका
और एक वक्त उसे मेटने का
पर यदि उसे देना चाहो
कोई भी अनचाही स्थिति
तो वह, वह नहीं रहकर
पथरा जाती है या बदल जाती है
थोड़ा और दर्द लेकर
किसी दूसरी ही संवेदना में
इसलिए क्षणांश का भ्रम ही सही
बहुत बार सही है मैंने भी व्यथा
अपने ही हाथों अपने आकाश को
विस्तार देने की चाह में
अगणित खंडों में बाँट देने की।
वीणा सिंह
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