Tuesday, November 10, 2020

मृत्यु

 

बर्फ़ की सिल पर

बर्फ़ हुई देह

क्रंदन से, स्पन्दन से

परे हुई देह।

निस्पंद बंद आँखों से

निरखती हो मानो

आवेश यह रुदन का

नाटक यह क्षण-क्षण का

नेह की स्पर्धा से 

अनछुई देह।

भीड़ के थमने पर

मौन के रमने पर

स्मृतियों के गह्वर में

चुप हुई देह।

दीवार पर सजती है

फ़्रेम में बँधती है

गेह के पाश में 

बँधी हुई देह।

आँगन की तुलसी में

बगिया की मेंहदी में

बेले की सुगंधि में

रची हुई देह।

संकेत से बरजती है

अनकही सब कहती है

मौन होकर और भी

मुखर हुई देह।

 

वीणा सिंह

 

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