Monday, November 9, 2020

थोड़ी सी नमी

 हमने कुम्हार की तरह थाम रखे हैं

अपने हाथों में 

अनगिनत अनगढ़ मन

अधूरे पात्रों की तरह।

ज़मीन है, मिट्टी है,

बस थोड़ी सी कमी है—-

नमी मिलते ही अभिभूत कर देंगे

ये अपने सौन्दर्य से।

जैसे दो पटरियों के बीच

पत्थरों में उगी दूब

धूप में झिलमिलाए

अपनी हरीतिमा में पूर्ण,

एक रोशनी बनकर

आँखों में उतर आए

या ग्रीष्म के मध्याह्न में

दूर कहीं किसी वंश-वन में हवा की लहर

एक तान बनकर गुजर जाए,

या मरुस्थल की चुभती धूप में 

कोई नील पक्षी

सौन्दर्य की कौंध बनकर ठहर जाए।

हम देंगे ऐसी ही नमी

जो चमत्कृत कर दे

अनेक अनगढ़ मनों को

जिन्हें हमने थाम रखा है।

 

वीणा सिंह

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