Wednesday, November 11, 2020

शब्दान्वेषण

 

चौड़े पाटों वाली नदियों को खोजते-खोजते 

शब्द गुम हो गए हैं कहीं पानी की सँकरी पगडंडियों में 

और हम उन्हें खोजते फिरते हैं। 

सफ़ेद मुर्दा दीवारों में टिक- टिक करती घड़ी 

कमरे में अधलेटी रिक्तता

रक्त के क़तरे सी फैलती 

ठक -ठक हथौड़े की चोट करती खाँसी 

या आँगन के कोने में मख़मली संवेदन जगाते गुलाब !

सब नज़रों  के आगे से गुज़र जाते हैं चुपचाप 

एक अनचाही पंक्ति बनकर ।

कल्पनाएं मौन पड़ी हैं रक्तरंजित

कँटीली साड़ियों में बिंधी 

रह रह कर सब पूछते हैं ——

क्यों नहीं तुम भी जीते हो पहाड़े रटते बच्चों की तरह 

या जाड़े की धूप में अलसाई देहों को सेंकते!

सृजन के इस सुख को मगर कैसे समझाएँ तुम्हें !

क्यों साथ-साथ  चितेरे बादलों   के  

रुकता  ठहरता दौड़ता मन वहीं जाना चाहता है 

जहाँ किसी शापग्रस्त राजकुमारी की तरह 

अनजान ऊँचे क़िले में क़ैद है

कोई कहानी, कविता या पंक्ति —

अगम सागर तल में सीपी-सा  

किसी पारदर्शी स्वप्न मुक्ता को प्रतीक्षारत 

और हम उन्हें खोजते फिरते हैं।

 

वीणा सिंह                       

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