रात जो सांकल खुली छोड़ दी
किसी चोर से , बड़ी भूल से
छूट गई गठरी भारी ।
गठरी मन ऐसा भरमाई
उसको बिन जांचे - परखे
अपने हिस्से की सौगात समझ
जैसे ही हलके से छुआ
निकली दिन की फेहरिस्त बड़ी
सो उगती भोर की प्रथम किरण संग
मन एकदम हो आया तीता
घर की चौखट को लाँघ बढ़े
तपते सूरज के साथ तपे
कुछ धूल -गर्द , आपाधापी
बढ़ते सूरज के साथ बढ़े
सब कामकाज जिम्मेदारी
हारी-बीमारी के थे चर्चे
संदेह-शुबह का था रोना
घटते सूरज के संग -संग
देखा अपना साया बौना
ढलते सूरज के साथ- साथ
घर लौट आए क़दमों भारी
मन एकदम हो आया रीता
ऐसे ही सारा दिन बीता
वीणा सिंह
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