Saturday, May 21, 2011

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे
सपनों की आहट को साथ चुना करते थे
अब तो अनकही सब फिजां में ठहर जाती है
होठों से उठती है सीने में ही लहराती है
खुदा तेरी ज़मीं और आसमा का फासला क्यों है
तेरी रहमतों के बीच एक साया छुपा क्यों है
तेरी इस आजमाइश में कोई सजदे में झुक गया
तू उस बन्दे को राहत दे तो उसमें बुरा क्यों है .
 
 
 वीणा  सिंह

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