घाटियों के बीच से
हरीतिमा की नदी बहती है
जादू की नदी अस्फुट मन्त्र कहती है.
पुरानी कहानी है
हर रात यहाँ कुछ नया होता आया है
मन्त्र के स्वर में बिंधा हुआ
आविष्ट भाव से डोलता
प्रवाह में खिंचा चला आया है
एक पीला पत्ता -
इस्पात की खुरचनें समेटे
पूरी तैयारी है
रात सुवासित है --
फूल से, ताजगी से
धरती ने पहने
लाल श्वेत फूलों के गजरे
चाँद है, रहस्य है, नमी है
बस एक क्षण और
धीरे-धीरे वह
इस्पात की केंचुल उतार डालेगा
और मिटटी की आर्द्रता को छूकर
हरा हो जाएगा.
वीणा सिंह
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