Friday, May 20, 2011

परदेस


रोज रात समंदर में जवार जब -जब आइल
फूट गइल छाला मन के ,आँख भर आइल 

पानी में डूब गइल सपना के पिटारी 
ओकरा में रहल हमर घर अउर अटारी   

नदी -तालाब  पाटके ,हम कैसन  सपना लायब
चाँद तलक सीढ़ी मगर चाँद  हाथ   न आयब 

इ कैसन देस ह बाबा ! इ कउन माटी
अंखियन में रेत भरल जियरा  निचाटी

होरी अऊर धनिया के जे रहलन आँख के   जोती 
छूट गैलन गाँव में पीछे हीरा-मोती

अमराई नीलाम भइल,बोझ भइल दूना
सोनचिरैया छोड़ गइल ,महल-गाँव सब सूना

बिन पनहीं रेत पर अब त चलल न जाला
लाख क मनवां खाक भइल, अब कौड़ी में बिकाला

काँकर-पाथर जोड़ के ,काँकर -पाथर भैनी
आवत रस्ता याद रहे ,जावत भूल गइनी

फाग-दिवाली करत-करत दिन बीतल  कई बरसों
अब अपने सूरत गैर भइल ,कल जाईं के परसों .


वीणा सिंह




1 comment:

  1. Very earthy . Reminds me of a migrant in Mumbai pining for home

    ReplyDelete