रोज रात समंदर में जवार जब -जब आइल
फूट गइल छाला मन के ,आँख भर आइल
पानी में डूब गइल सपना के पिटारी
ओकरा में रहल हमर घर अउर अटारी
नदी -तालाब पाटके ,हम कैसन सपना लायब
चाँद तलक सीढ़ी मगर चाँद हाथ न आयब
इ कैसन देस ह बाबा ! इ कउन माटी
अंखियन में रेत भरल जियरा निचाटी
होरी अऊर धनिया के जे रहलन आँख के जोती
छूट गैलन गाँव में पीछे हीरा-मोती
अमराई नीलाम भइल,बोझ भइल दूना
सोनचिरैया छोड़ गइल ,महल-गाँव सब सूना
बिन पनहीं रेत पर अब त चलल न जाला
लाख क मनवां खाक भइल, अब कौड़ी में बिकाला
काँकर-पाथर जोड़ के ,काँकर -पाथर भैनी
आवत रस्ता याद रहे ,जावत भूल गइनी
फाग-दिवाली करत-करत दिन बीतल कई बरसों
अब अपने सूरत गैर भइल ,कल जाईं के परसों .
वीणा सिंह
Very earthy . Reminds me of a migrant in Mumbai pining for home
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