जाली की सुतली की बुनी हुई खाट पर
औंधे मुंह लेटा है ओरचन की पाट पर
आसमान की गोद से है जी अनसा गया
या किस्से -कहानी का मौसम है आ गया
आवारा लड़के सा डोल-डोल रात भर
मुंह फुला बैठा है जाने किस बात पर
गुमसुम सा उलझा है जाली के जाल से
बाज आया चाँद भी ऐसे जंजाल से
पर्वत वन नदी ताल पहले तो दौड़ाया
अब इतनी देर में लगता है प्यार आया
जुगनुओं की फ़ौज को मनाने को भेजा है
आसमाँ भी ख़ूब है,कैसा कठकरेजा है।
अब इतनी देर में लगता है प्यार आया
जुगनुओं की फ़ौज को मनाने को भेजा है
आसमाँ भी ख़ूब है,कैसा कठकरेजा है।
वीणा सिंह
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