महानगर की सुबह बौराती है
घड़ी के काँटों पर टंगी बासी कमीज़ सी
घड़ी के काँटों पर टंगी बासी कमीज़ सी
आँखें चुराती है
फैला है दिन सामने
खाली मैदान सा
बूढे-बुजुर्ग सा दिलासा दे जाता है
मन को सहलाता है
शाम को सिकुड़ जाता है
किसी फ्लैट के दालान सा
गठिया की मारी
रात दुखियारी
झरती बूँदें ओढ़े
दुखते घुटने मोड़े
कल की सुबह
जूठे बर्तन सी मुंह बिराती है .
फैला है दिन सामने
खाली मैदान सा
बूढे-बुजुर्ग सा दिलासा दे जाता है
मन को सहलाता है
शाम को सिकुड़ जाता है
किसी फ्लैट के दालान सा
गठिया की मारी
रात दुखियारी
झरती बूँदें ओढ़े
दुखते घुटने मोड़े
कल की सुबह
जूठे बर्तन सी मुंह बिराती है .
वीणा सिंह
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