Wednesday, March 16, 2011

महानगर की सुबह

महानगर की सुबह बौराती है
घड़ी के काँटों पर टंगी बासी कमीज़ सी 
आँखें चुराती है
फैला है दिन सामने
खाली मैदान सा
बूढे-बुजुर्ग  सा दिलासा दे जाता है
मन को सहलाता है
शाम को सिकुड़ जाता है
किसी फ्लैट के दालान सा
गठिया की मारी
रात दुखियारी
झरती बूँदें ओढ़े 
दुखते घुटने मोड़े 
कल  की सुबह
जूठे बर्तन सी मुंह बिराती है .


वीणा सिंह 


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