मेरी हिमाकत मेरे गुरूर को मुआफ कर
गर ऊंची शाख पर गुमसुम से उस परिंदे को
उसकी तन्हाई के आलम से जगाया मैंने--
गुनगुनाये , मेरे हुक्म की तामील करे !
सर्द मौसम में बरबादियों के किस्से को लरजते होंठों से नगमों में पिघल जाने दे .
जैसे ख़्वाबों में कोई लरजिश हो
या हकीक़त में कोई साज़िश हो
अपने होंठों पर शिकायत लाके
उसके नगमे नाकाम कहते हैं ----
जैसे चौराहे पर नुमाइश हो
तमाशबीन आके निकल जाते हैं
हवस का मारा कोई बेजुबान किस्सा हो
तलाश ख्वाब की , हकीक़त की नहीं
आते हैं रंगो-बू तलाश करने को
शिरकत में किसी मय्यत की नहीं.
और किस्से थे पहले बयाँ इस जन्नत में
अब दोजख की हवा छू के निकल जाती है
कुछ और भी रंग होते थे इस वादी में
अब हर साँस पर लहू का रंग तारी है .
सर्द रातों में मेरा नगमा
एक साए सा फिरा करता है
सीने पर दर्द का असबाब लिए
कश्मीर शिकारे में रोज फिरता है.
वीणा सिंह
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