सोचो, अगर मैं खेल-खेल में
चम्पा वृक्ष की ऊँची शाख़ पर
नन्हा-सा एक फूल बन जाऊँ !
हवा में झूमे जो डाली ,
खिल-खिल करता उसे हिलाऊँ।
नव-मुकुलित पत्तों के ऊपर
नृत्य करूँ, मुदित हो जाऊँ,
माँ, मुझको तब पहचानोगी क्या?
“कहाँ छुपे हो बेटे ?” कहकर
माँ जब मुझे पुकारोगी
बिलकुल मौन रहूँगा मैं
पुलकित मन मैं हँस दूँगा
फिर चुपके से खोल पँखुड़ी
तुम्हें व्यस्त मैं देखूँगा
कंधों पर अलकें बिखराये
देवस्तुति को प्रस्तुत जब
नन्हें प्रांगण में आओगी
एक निमिष को ठिठकोगी जब
चम्पा की सुगंध पा जाओगी
भीनी सी कोई सुगन्ध
नन्हें प्रांगण में छायी है
यह सुरभित बयार मुझसे ही होके आयी है
माँ! बोलो तो पहचानोगी क्या?
दुपहरी में झरोखे पर
जब रामायण ले बैठोगी
चम्पा की छाया ढँक लेगी तब
तुम्हारी अलकों को, आँचल को
जहाँ खुले पन्नों के ऊपर
दृष्टि तुम्हारी जमी होगी
अपनी नन्हीं प्रतिच्छाया मैं
ठीक वहीं फैला दूँगा
यह नन्ही-सी छाया
अपने ही नन्हें बेटे की है
माँ ! बोलो तो पहचानोगी क्या?
संझा को जब जलती बाती ले
जाओगी गोशाला में
कूद पड़ूँगा शाख़ से नीचे
मैं सहसा आ टपकूँगा
“मुझे सुनाओ एक कहानी।”
कह ज़िद्दी बेटा बन जाऊंगा।
फिर होंगी नित दिन सी बातें
“ कहाँ छुपे थे नटखट बेटे?”
अचरज से तुम बोलोगी।
मैं फिर तुमसे लिपट कहूँगा।
-“ माँ, तुमको नहीं बताऊंगा।”
वीणा सिंह
(रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता पर आधारित)
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