सोचता हूँ, मेरे लिए मनुष्य के मन में कैसी भावनाएँ होंगी? कभी भय, कभी पुचकार, कभी धिक्कार, थोड़ी प्रशंसा—- इन्हीं गिनी-चुनी भावनाओं एवं प्रतिक्रियाओं की डोर से हम दोनों प्राणियों का जीवन बँधा है। निश्चित कार्यकलापों, दिनचर्याओं में बँधे जीवन में लॉकडाउन ने कई महीनों से बड़ी नीरसता ला दी है । हलचल और गहमागहमी से भरे पुराने दिनों के बारे में सोचता रहता हूँ और यही बात दिमाग़ में घूमती रहती है कि जो पीछे छूट गये हैं क्या वे भी मुझे याद करते हैं? कैसे होंगे वे सब? कब आएंगे यहाँ? कब उनके कदमों की आहट सुनूँगा?
उनके आने के दिनों के बीच का अन्तराल बढ़ता ही जाता है। जानता हूँ, उनकी मजबूरियाँ हैं। कुछ तो महीनों के स्वप्न संजोए बस आने ही वाले होते हैं कि अचानक देखता हूँ, घरवालों के चेहरे मुरझा गये। समझ जाता हूँ—आना नहीं हो सका। जिस हलचल ने में मेरे जीवन में जरा सा प्रवेश किया, वह बोरियत में बदल जाती है। बस फिर वही—- एक-से दिन, एक-सी रातें। मुझे लगता है, मनुष्य मेरे व्यवहार, मेरे कार्यकलाप को पूरी तरह समझ नहीं पाता। श्वान जाति का भूँकना, सिर्फ़ बाह्य व्यवहार या उसकी प्रकृति नहीं है, विभिन्न प्रतिक्रियाएँ हैं। अब देखिये—- जब इस घर की सुरक्षा पर आँच आने लगती है, तब मेरे अन्दर पूरी शिद्दत से प्रतिकार करने की इच्छा जागना स्वाभाविक है। लेकिन जब घरवाले मेरी उपस्थिति को भूल जाएँ, तो उन्हें भी याद दिलाना मेरा हक़ है , क्यों है न? गेट पर दौड़ती गिलहरी जब उसकी साँकल खटखटाती है, तो मैं भूँक कर यही तो कहना चाहता हूँ, तुम मेरे पास आती क्यों नहीं? लेकिन रात को स्टोर रूम के चूहे उत्पात मचायें तो मेरा कर्तव्य बनता है कि नहीं कि घर पर अपने स्वामित्व का अहसास दिलाऊँ? इन बातों के महीन फ़र्क़ का एहसास मनुष्यों में है, इसका मुझे सन्देह है। इसी तरह जब मैदान में खेलते बच्चों को गेंद उछालते देखता हूँ तब मेरा बिना वजह भूँकना किसी को समझ नहीं आता, पर सच पूछिये तो उन्हें देख मेरा दिल बल्लियों उछलने लगता है। मैं उनके सामने अपने अस्तित्व का एहसास शोर मचाकर करता हूँ। आख़िर इस तरह की करामात तो मैं भी कर सकता हूँ।
लेकिन हाल ही में मेरी इस एकरस दिनचर्या में सुखद परिवर्तन आया। हालाँकि कुछ दिनों से मैं इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में एक बदलाव सा महसूस कर रहा था। पूर्व अनुभवों के आधार पर समझा कि इस नीरवता के धागे को तोड़कर , जो हलचल तरंगित हो रही थी, वह किसी के आने की सुखद खबर है।
दो-तीन दिनों के अन्दर ही घर में दो स्त्रियों ने प्रवेश किया । साथ में बड़ा सा सूटकेस। उनमें से एक तो मेरी परिचित थी, जो दो सालों के बाद मिली थी। और दूसरी को पहली बार देखा।
मुझे बड़ा दुख होता है जब मनुष्य मेरी प्रकृति पर सन्देह प्रकट करता है और सोचता है कि मैं तहज़ीब को समझ नहीं पाता। अरे भाई, घर के लोग हैं, बस थोड़ी सी ख़ुशी ही तो व्यक्त कर रहा हूँ। अब इस सन्देह के कारण ज़ंजीरों में क्यों बँधा हूँ? पर जो भी है, कुछ दिनों के लिए बँधकर ही रहना होगा।
बड़ी उम्र की स्त्री के बाल सफ़ेद हो चले थे, लेकिन बच्चों की तरह का भय आँखों में था। सच पूछिए तो हम दोनों आँखों ही आँखों में एक दूसरे को तौल रहे थे। अच्छा चलो, धीरे-धीरे परिचय होगा।
घर में जब मेरी स्वामिनी सुबह सबेरे एक कमरे में बन्द हो जाती, मैं समझ जाता। अब तीन घंटों तक बस अन्दर से उसकी बातें ही सुनाई देंगी। यह तो यहाँ रोज़ की दिनचर्या थी। लेकिन नए अतिथियों में से भी एक ने जब अपने आप को दिन भर के लिए बन्द कर लिया तो मैं ऊब कर इधर-उधर भटकता रहा। रोज़ाना ८ से ८ की उसकी यह दिनचर्या मुझे बड़ी विचित्र लगती। कमरे के अंदर क्या हो रहा है, यह जानने की उत्सुकता मेरे अन्दर हलचल मचा देती। इसी रहस्य के आवरण को उजागर करने के प्रयत्न में जब एक दिन दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, तो मैं हिम्मत करके दहलीज़ पर खड़ा हो गया और ज़ोर-ज़ोर से कमरे की स्वामिनी से सवाल-जवाब करने लगा। आख़िर कमरा बन्द करके मशीन से बातें करना भी क्या स्वाभाविक है? क्या दुनिया के सभी अन्य प्राणी, मनुष्यों को इतना तुच्छ जान पड़ते हैं आजकल? जो भी हो अपनी इस बेअदबी पर मैं पुचकारा जाके ही कमरे से बाहर कर दिया गया, यही ग़नीमत है। लेकिन अगले एक दो दिनों में दूसरी अपरिचिता मुझसे घुलने-मिलने लगी, हालाँकि पहल तो मुझे ही करनी पड़ती। मैं सुबह सवेरे जाकर इन्तज़ार में रहता कि उसे कैसे जगाऊँ । जैसे ही वह उठती, मैं उसके पैरों को छूकर भागने की कोशिश करता, पर समझ गया कि वह प्यार तो करती है, पर पास नहीं आने देती। कोई बात नहीं , मैं तो शुरू से ही सहनशील हूँ । बस वह जहाँ बैठती, वहीं बैठता, लेकिन
थोड़ा परे। घूम-घूम कर उसे देखता और धीरे-धीरे हम दोनों का सामीप्य हमारी आँखों में स्पष्ट दिखाई देने लगा। और एकाध दिन के बाद तो वह पैरों से ही सही मेरी पीठ को सहलाती, नाम लेकर पुकारती और कोशिश करती कि मुझे ज़ंजीरों में बँधा पाकर, मुक्त कर दे। हालाँकि वर्तमान स्थिति में हम दोनों ही कुछ और नहीं कर पाते, बस पास-पास समय बिताते जबतक कि मेरी स्वामिनी दूसरे कमरे में घंटों अकेले बातें करने की अपनी ड्यूटी निभाकर आज़ाद न हो जाती।
मेरे दिन उन दिनों भरे-पूरे हो गए। हालाँकि बारिश के गीलेपन में हम सब अपने घेरे को लाँघ नहीं पाते थे, पर अपनेपन की ज़ंजीरों में बँध कर अत्यंत सन्तोष का अनुभव कर रहे थे।
श्वान जाति को कुदरती तौर पर अपने अन्दर महसूस करने की शक्ति रहती है। जाहिराना तौर पर इतर जातियों को भले ही यह शक्ति अपेक्षाकृत कम हो , हम सब को यह आसानी से महसूस होती है। इसी प्रकृति ने मुझे अवगत कराया कि आनेवाले दिनों में कोई न कोई बदलाव होने वाला है। इन दिनों मेरी स्वामिनी शायद ही घर की दहलीज़ लाँघती। पर अचानक एक दिन मैंने उन्हें पूरी तरह से सुरक्षा-कवच से लैस होकर बाहर जाते देखा । हालाँकि जाते-जाते वे कहके जा रही थीं कि वे ज़रूरी काम से बाहर जा रही थीं, फिर भी यह अस्वाभाविक लगा। सफ़ेद बालों वाली अपरिचिता ( अब उन्हें इस नाम से पुकारना उचित न होगा) यानी दीदी भले ही न समझी हों, मुझे अभास हो गया कि यह आनेवाले दिनों के बदलाव की पृष्ठभूमि है।
३-४ घंटों के बाद जब स्वामिनी लौटीं तो मानो एवरेस्ट विजय की ख़ुशी से भरी हुई। उनके हाथों में उपहार के अनेक पैकेट्स थे जो इस बात का पर्दाफ़ाश कर रहे थे कि हमारे मेहमानों के लौटने का दिन पास आ रहा है।
सच कहूँ तो उस दिन से मेरी उम्मीदें टूट गयीं। पता चला सिर्फ़ एक दिन और। परसों हमारे मेहमान लौट जाएंगे । सच पूछिए तो मेरे लिए अपनी स्वाभाविक ख़ुशी में लौट पाना असम्भव हो गया। आँखों में सूनापन भर गया, कदम भारी हो गये और प्लेट में रखे खाने की ओर देखने की कोई इच्छा न रही।
और अन्त में वह दिन आ ही गया। मैं फिर ज़ंजीर में बँध गया—— मुझमें प्रतिकार करने की शक्ति भी कितनी बाक़ी थी? जो जा रहे थे , उनकी आँखों की गहरी उदासी असह्य थी। दोनों मुझसे कह रही थीं , “हम फिर आएँगे डीज़ल । तुम अच्छी तरह से रहना।” धीरे-धीरे सामान लदे, अपनों ने बार-बार पीछे मुड़कर देखा और फिर उन्हें लेकर गाड़ी चल पड़ी—- पीछे रह गयीं इन थोड़े से दिनों की अनुभूतियाँ। मेरी आँखों की गहरी निराशा देखकर मेरी स्वामिनी ने मुझे ज़ंजीरों से मुक्त किया और कहा—— “चलो डीज़ल, छत पर चलते हैं।”
लम्बी साँस लेकर धीरे कदमों से इस अन्तिम संवेदना का छोर पकड़कर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।
वीणा सिंह
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