बन्द दीवारों के बाहर
जब लगी थी पहरेदारी
क़ैद तोड़कर ग़ुब्बारों ने
नोटिस कर दी जारी।
तय थी मीटिंग नोटिस में,
साथ में लाल फूल भिजवाया
ऑनलाइन के कलाकार थे
डिजिटल दिल ❤धड़काया।
ड्रेस तुम्हारी जैसी भी हो
Mandatory हैं मुखौटे !
Protocol नहीं मानी तो
समझो बैरंग लौटे।
बहुत महीनों बाद हुई फिर
ग़ुब्बारों की बातें—
एक डोर में बँधी हो रही,
गुप-चुप सी मुलाक़ातें
सारे के सारे ग़ुब्बारे
गेंद की तरह उछलके,
रंग-बिरंगे फूलों से वे
हरी लॉन में झलके।
एक दूजे पर गिरते-पड़ते
यहाँ-वहाँ सब फिरते,
आसमान धरती के बीच
सुन्दर सपनों से तिरते।
वीणा सिंह
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