किसी योद्धा की तरह
भारी जिरह-बख्तर से लैस
मैं बैठा हूँ इस व्हील चेयर पर।
पौराणिक कथा के अनेक पात्र
घुलमिल गये हैं मेरे भीतर—
अर्जुन की शर-संधान दृष्टि
नापती है दिशाओं को,
कृष्ण के दिव्य रथ पर बैठा,
युद्ध क्षेत्र में पड़े शरीर की तरह
फलाँगता अनेक मृत-विस्मृत
कथा-सन्दर्भ, रक्तिम व्रण,
कीच में धँसे क्षण
काल के व्यूह को भेदता
अठारह अँधेरे युगों को
ढकेलता प्राणपण!
अपने कमजोर कंधों पर
दुर्वासा बनी पृथ्वी के शाप को
वहन करता प्रतिबद्ध
अभिमुख, नत।
हर बार एक नये द्रोण की
तर्जनी थामे
काल की धारा में बहता
अभीष्ट की सिद्धि में
अनेक प्रहार सहता
भयभीत रहता हूँ—
कहीं इस बार भी
जातिच्युत न हो जाऊँ ।
वीणा सिंह
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