Saturday, January 17, 2026

स्वप्न राग

 


स्निग्धता का मलय वात है,

पिघले कुंकुम में रंगा प्रात है,

हरित राशि ऋतु साथ-साथ है,

नव उन्मीलित जलजात है।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं।


अनन्त में कोई अग्निकण हो

पराग का पीताभ वन हो,

इन्द्रधनु में स्नात वन हो

लाल युवा ऊर्जस्वित तन हो।


दिग-दिगन्त पर अग्नि लेख

चित्रित करते इनके कर हैं।


तरल अगन सा मध्याह्न में

पट परिवर्तन हो आंगन में

जाल बिछा अहेरी क्षण में

शर-संधान करे निर्जन में।


निशि-याम क्रन्दन रोदन है

भयभीत वाण हत जर्जर हैं।


निमिष मात्र मन के प्रांगण में

रक्त स्नात टूटे दर्पण में,

सहस्र बिम्बों के कम्पन में 

शेष कथा बाँचे जीवन में ।


हों धराशेष हों मुक्तप्राण

फिर भी चंचल उनके पर हैं


हुलसित प्राची का स्वर किंकण 

दुर्द्धर्ष वात चंडी नर्तन 

क्लान्त दिवस प्रत्यावर्तन 

राग राग का अनुरणन ।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं ।


वीणा सिंह



Thursday, November 25, 2021

मोहाविष्ट

 सूरज की पहली लाली संग

चला बटोही हँसते-हँसते

सपनों का पाथेय संग था

अनजाने थे उसके रस्ते

 

अनजानी थी सभी दिशायें

मोहाविष्ट चला जाता था

मन ही मन अपनी धुन में वह

सपनों को बुनता जाता था

 

कौन भला रोकेगा उसको

उड़ता जाता पर फैलाये

अनन्त समन्दर सा फैला नभ

पल-पल उसको पास बुलाये

 

उन्नत शाख़, शाख़ पर झूले

झूलों पर फूलों के गहने

मद्धम-मद्धम से बयार में 

सारे गहने लगते अपने

नीम अँधेरे देखे सपने 

सच में मिथ्या मिला हुआ था

जैसे सच की एक सीपी में

झूठ का मोती खिला हुआ था

 

नीले नभ के एक कोने में

धूसर बदली की थी छाया

पल भर में जाने फिर कैसे 

कोमल बयार की बदली माया

 

झंझावात के आलोड़न में 

सपनों का पाथेय कहाँ था?

होंठों की मुस्कान कहाँ थी?

जीवन का वह ध्येय कहाँ था?

 

पल में सिमट गया सारा जल

अन्तर के गहरे सागर में

सहमा-सहमा बैठ गया फिर

उसके नयनों के गागर में

 

वीणा सिंह

Wednesday, November 24, 2021

व्हील चेयर

 

किसी योद्धा की तरह 

भारी जिरह-बख्तर से लैस

मैं बैठा हूँ इस व्हील चेयर पर।

पौराणिक कथा के अनेक पात्र 

घुलमिल गये हैं मेरे भीतर—

अर्जुन की शर-संधान दृष्टि 

नापती है दिशाओं को,

कृष्ण के दिव्य रथ पर बैठा,

युद्ध क्षेत्र में पड़े शरीर की तरह

फलाँगता अनेक मृत-विस्मृत 

कथा-सन्दर्भ, रक्तिम व्रण,

कीच में धँसे क्षण

काल के व्यूह को भेदता

अठारह अँधेरे युगों को 

ढकेलता प्राणपण!

अपने कमजोर कंधों पर

दुर्वासा बनी पृथ्वी के शाप को

वहन करता प्रतिबद्ध

अभिमुख, नत।

हर बार एक नये द्रोण की 

तर्जनी थामे

काल की धारा में बहता

अभीष्ट की सिद्धि में 

अनेक प्रहार सहता

भयभीत रहता हूँ—

कहीं इस बार भी

जातिच्युत न हो जाऊँ ।

 

वीणा सिंह                             

 

Friday, October 1, 2021

लॉकडाउन में ग़ुब्बारे

बन्द दीवारों के बाहर 

जब लगी थी पहरेदारी 

क़ैद तोड़कर ग़ुब्बारों ने 

नोटिस कर दी जारी।

 

तय थी मीटिंग नोटिस में,

साथ में लाल फूल भिजवाया 

ऑनलाइन के कलाकार थे

डिजिटल दिल ❤धड़काया।

 

ड्रेस तुम्हारी जैसी भी हो

Mandatory हैं मुखौटे !

Protocol नहीं  मानी तो

समझो बैरंग लौटे।

 

बहुत महीनों बाद हुई फिर

ग़ुब्बारों की बातें—

एक डोर में बँधी हो रही,

गुप-चुप सी मुलाक़ातें 

 

सारे के सारे ग़ुब्बारे

गेंद की तरह उछलके,

रंग-बिरंगे फूलों से वे

हरी लॉन में झलके।

 

एक दूजे पर गिरते-पड़ते 

यहाँ-वहाँ सब फिरते,

आसमान धरती के बीच

सुन्दर सपनों से तिरते।

 

वीणा सिंह 

Sunday, September 12, 2021

मी डीज़ल बोलतो


 

सोचता हूँ, मेरे लिए मनुष्य के मन में कैसी भावनाएँ होंगी? कभी भय, कभी पुचकार, कभी धिक्कार, थोड़ी प्रशंसा—- इन्हीं गिनी-चुनी भावनाओं एवं प्रतिक्रियाओं की डोर से हम दोनों प्राणियों का जीवन बँधा है। निश्चित कार्यकलापों, दिनचर्याओं में बँधे जीवन में  लॉकडाउन ने कई महीनों से बड़ी नीरसता ला दी है । हलचल और गहमागहमी से भरे पुराने दिनों के बारे में सोचता रहता हूँ और यही बात दिमाग़ में घूमती रहती है कि जो पीछे छूट गये हैं क्या वे भी मुझे याद करते हैं? कैसे होंगे वे सब? कब आएंगे यहाँ? कब उनके कदमों की आहट सुनूँगा?

 

उनके आने के दिनों के बीच का अन्तराल बढ़ता ही जाता है। जानता हूँ, उनकी मजबूरियाँ हैं। कुछ तो महीनों के स्वप्न संजोए बस आने ही वाले होते हैं कि अचानक देखता हूँ, घरवालों के चेहरे मुरझा गये। समझ जाता हूँ—आना नहीं हो सका। जिस हलचल ने में मेरे जीवन में जरा सा प्रवेश किया, वह बोरियत में बदल जाती है। बस फिर वही—- एक-से दिन, एक-सी रातें। मुझे लगता है, मनुष्य मेरे व्यवहार, मेरे कार्यकलाप को पूरी तरह समझ नहीं पाता। श्वान जाति का भूँकना, सिर्फ़ बाह्य व्यवहार या उसकी प्रकृति नहीं है, विभिन्न प्रतिक्रियाएँ हैं। अब देखिये—- जब इस घर की सुरक्षा पर आँच आने लगती है, तब मेरे अन्दर पूरी शिद्दत से प्रतिकार करने की इच्छा जागना स्वाभाविक है। लेकिन जब घरवाले मेरी उपस्थिति को भूल जाएँ, तो उन्हें भी याद दिलाना मेरा हक़ है , क्यों है न? गेट पर दौड़ती गिलहरी जब उसकी साँकल खटखटाती है, तो मैं भूँक कर यही तो कहना चाहता हूँ, तुम मेरे पास आती क्यों नहीं? लेकिन रात को स्टोर रूम के चूहे उत्पात मचायें तो मेरा कर्तव्य बनता है कि नहीं कि घर पर अपने स्वामित्व का अहसास दिलाऊँ? इन बातों के महीन फ़र्क़ का एहसास मनुष्यों में है, इसका मुझे सन्देह है। इसी तरह जब मैदान में खेलते बच्चों को गेंद उछालते देखता हूँ तब मेरा बिना वजह भूँकना किसी को समझ नहीं आता, पर सच पूछिये तो उन्हें देख मेरा दिल बल्लियों उछलने लगता है। मैं उनके सामने अपने अस्तित्व का एहसास शोर मचाकर करता हूँ। आख़िर इस तरह की करामात तो मैं भी कर सकता हूँ।

लेकिन हाल ही में मेरी इस एकरस दिनचर्या में सुखद परिवर्तन आया। हालाँकि कुछ दिनों से मैं इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में एक बदलाव सा महसूस कर रहा था। पूर्व अनुभवों के आधार पर समझा कि इस नीरवता के धागे को तोड़कर , जो हलचल तरंगित हो रही थी, वह किसी के आने की सुखद खबर है।

दो-तीन दिनों के अन्दर ही घर में दो स्त्रियों ने प्रवेश किया । साथ में बड़ा सा सूटकेस। उनमें से एक तो मेरी परिचित थी, जो दो सालों के बाद मिली थी। और दूसरी को पहली बार देखा।

मुझे बड़ा दुख होता है जब मनुष्य मेरी प्रकृति पर सन्देह प्रकट करता है और सोचता है कि मैं तहज़ीब को समझ नहीं पाता। अरे भाई, घर के लोग हैं, बस थोड़ी सी ख़ुशी ही तो व्यक्त कर रहा हूँ। अब इस सन्देह के कारण ज़ंजीरों में क्यों बँधा हूँ? पर जो भी है, कुछ दिनों के लिए बँधकर ही रहना होगा। 

बड़ी उम्र की स्त्री के बाल सफ़ेद हो चले थे, लेकिन बच्चों की तरह का भय आँखों में था। सच पूछिए तो हम दोनों आँखों ही आँखों में एक दूसरे को तौल रहे थे। अच्छा चलो, धीरे-धीरे परिचय होगा।

घर में जब मेरी स्वामिनी सुबह सबेरे एक कमरे में बन्द हो जाती, मैं समझ जाता। अब तीन घंटों तक बस अन्दर से उसकी बातें ही सुनाई देंगी। यह तो यहाँ रोज़ की दिनचर्या थी। लेकिन नए अतिथियों में से भी  एक ने  जब अपने आप को दिन भर के लिए बन्द कर लिया तो मैं ऊब कर इधर-उधर भटकता रहा। रोज़ाना ८ से ८ की उसकी यह दिनचर्या मुझे बड़ी विचित्र लगती। कमरे के अंदर क्या हो रहा है, यह जानने की उत्सुकता मेरे अन्दर हलचल मचा देती। इसी रहस्य के आवरण को उजागर करने के प्रयत्न में जब एक दिन दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, तो मैं हिम्मत करके दहलीज़ पर खड़ा हो गया और ज़ोर-ज़ोर से कमरे की स्वामिनी से सवाल-जवाब करने लगा। आख़िर कमरा बन्द करके मशीन से बातें करना भी क्या स्वाभाविक है? क्या दुनिया के सभी अन्य प्राणी, मनुष्यों को इतना तुच्छ जान पड़ते हैं आजकल? जो भी हो अपनी इस बेअदबी पर मैं पुचकारा जाके ही कमरे से बाहर कर दिया गया, यही ग़नीमत है। लेकिन अगले एक दो दिनों में दूसरी अपरिचिता मुझसे घुलने-मिलने लगी, हालाँकि पहल तो मुझे ही करनी पड़ती। मैं सुबह सवेरे जाकर इन्तज़ार में रहता कि उसे कैसे जगाऊँ । जैसे ही वह उठती, मैं उसके पैरों को छूकर भागने की कोशिश करता, पर समझ गया कि वह प्यार तो करती है, पर पास नहीं आने देती। कोई बात नहीं , मैं तो शुरू से ही सहनशील हूँ । बस वह जहाँ बैठती, वहीं बैठता, लेकिन 

थोड़ा परे। घूम-घूम कर उसे देखता और धीरे-धीरे हम दोनों का सामीप्य हमारी आँखों में स्पष्ट दिखाई देने लगा। और एकाध दिन के बाद तो वह पैरों से ही सही मेरी पीठ को सहलाती, नाम लेकर पुकारती और कोशिश करती कि मुझे ज़ंजीरों में बँधा पाकर, मुक्त कर दे। हालाँकि वर्तमान स्थिति में हम दोनों ही कुछ और नहीं कर पाते, बस पास-पास समय बिताते जबतक कि मेरी स्वामिनी दूसरे कमरे में घंटों अकेले बातें करने की अपनी ड्यूटी निभाकर आज़ाद न हो जाती।

मेरे दिन उन दिनों भरे-पूरे हो गए। हालाँकि बारिश के गीलेपन में हम सब अपने घेरे को लाँघ नहीं पाते थे, पर अपनेपन की ज़ंजीरों में बँध कर अत्यंत सन्तोष का अनुभव कर रहे थे।

श्वान जाति को कुदरती तौर पर अपने अन्दर महसूस करने की शक्ति रहती है। जाहिराना तौर पर इतर जातियों को भले ही यह शक्ति अपेक्षाकृत कम हो , हम सब को यह आसानी से महसूस होती है। इसी प्रकृति ने मुझे अवगत कराया कि आनेवाले दिनों में कोई न कोई बदलाव होने वाला है। इन दिनों मेरी स्वामिनी शायद ही घर की दहलीज़ लाँघती। पर अचानक एक दिन मैंने उन्हें पूरी तरह से सुरक्षा-कवच से लैस होकर बाहर जाते देखा । हालाँकि जाते-जाते वे कहके जा रही थीं कि वे ज़रूरी काम से बाहर जा रही थीं, फिर भी यह अस्वाभाविक लगा। सफ़ेद बालों वाली अपरिचिता ( अब उन्हें इस नाम से पुकारना उचित न होगा) यानी दीदी भले ही न समझी हों, मुझे अभास हो गया कि यह आनेवाले दिनों के बदलाव की पृष्ठभूमि है।

३-४ घंटों के बाद जब स्वामिनी लौटीं तो मानो एवरेस्ट विजय की ख़ुशी से भरी हुई। उनके हाथों में उपहार के अनेक पैकेट्स थे जो इस बात का पर्दाफ़ाश कर रहे थे कि हमारे मेहमानों के लौटने का दिन पास आ रहा है।

सच कहूँ तो उस दिन से मेरी उम्मीदें टूट गयीं। पता चला सिर्फ़ एक दिन और। परसों हमारे मेहमान लौट जाएंगे । सच पूछिए तो मेरे लिए अपनी स्वाभाविक ख़ुशी में लौट पाना असम्भव हो गया। आँखों में सूनापन भर गया, कदम भारी हो गये और प्लेट में रखे खाने की ओर देखने की कोई इच्छा न रही।

और अन्त में वह दिन आ ही गया। मैं फिर ज़ंजीर में बँध गया—— मुझमें प्रतिकार करने की शक्ति भी कितनी बाक़ी थी? जो जा रहे थे , उनकी आँखों की गहरी उदासी असह्य थी। दोनों मुझसे कह रही थीं , “हम फिर आएँगे डीज़ल । तुम अच्छी तरह से रहना।” धीरे-धीरे सामान लदे, अपनों ने बार-बार पीछे मुड़कर देखा  और फिर उन्हें लेकर गाड़ी चल पड़ी—- पीछे रह गयीं इन थोड़े से दिनों की अनुभूतियाँ। मेरी आँखों की  गहरी निराशा देखकर मेरी स्वामिनी ने मुझे ज़ंजीरों से मुक्त किया और कहा—— “चलो डीज़ल, छत पर चलते हैं।”

लम्बी साँस लेकर धीरे कदमों से इस अन्तिम संवेदना का छोर पकड़कर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।


वीणा सिंह 

Friday, November 13, 2020

फागुन


सखि आमों की बौर में फागुन लहराया 

पात -पात फूल -फूल इन्द्र धनुष छाया

अलसाये दिन आए भीगी- सी रातें 

फागुन की ताल पर  विरहा की बातें 

कोयल की कूजन  में मन भरमाया 

लता बेलि फूली है बातास  उमगा 

मनवा पहाड़ हुआ भोर रतजगा

टटकी सी आँच में गुलमोहर सरसाया 

टेसू की   आग जरे वन-पहाड़ सारे 

व्याकुल सा आधी रात पाखी टिटकारे

द्वारे पड़ी पाती पर पाहुन न आया 

सखि आमों की बौर में फागुन  लहराया।

 

सखि तुमने खूब कही फागुन की बात 

हम तो दिहाड़ी पर मज़दूरों की जात

फिर भी दिखे रहें कुछ लाल-हरे पत्ते 

बिलकुल  बेनूर जैसे कागज़ के गत्ते 

कहीं-कहीं भूल से कोई फूल मुस्काया 

जैसे गलती से कोई पराये देश आया 

आकाश राख सा  न बादल के पहरे 

सब के सब जैसे दिल पर जा ठहरे

ऊष्मा अगर हो तो सावन कहीं बरसे 

रस के हो छींटे तो तो फागुन भी सरसे 

जैसे कोई कर्ज़ हो पिछले जनम का 

होठों पर ठहरा हो साया गुमसुम सा 

रात दिन बैरी समय बैठा दरवाज़े 

मूल पर सूद -पर -मूल धरे साजे

अंतर के दाह बीच फागुन ऋतु आयी

एक साथ चल रही दोनों  की पहुनाई।

 

वीणा सिंह                              

Thursday, November 12, 2020

शायद हम उन दिनों

 शायद हम उन दिनों

जीते थे ख़्वाब में 

कोई सवाल ले

डूबे थे आप में 

 

लोग ये कहते हैं 

मैं ही वाक़िफ़  न था 

वरना कुछ देर को 

मौसम बदला तो था 

 

उंगलियाँ थामकर 

घण्टों थे  साथ हम 

दरिया किनारे पर 

देर गई रात हम 

 

कितने तूफ़ान उठे 

मैं ही बेफिक्र था 

वरना कुछ देर को 

मौसम बदला तो था

 

कब धरती हरियाई

कब मौसम लाल था 

अपने ही दिल में 

जवाब था सवाल था

 

कितने अरमान उठे 

मैं ही वाक़िफ़ न था

अपने ही दिल में 

मौसम बदला सा था 

 

दिल में कोंपल खिली

निंदयाई अधजगी 

एक जादू सी बँधी 

अरुणाई में रंगी 

 

लोग ये कहते हैं कि 

मैं ही वाक़िफ़ न था

मैं तुम से कहता हूँ

मौसम बदला तो  था      


वीणा सिंह